Poem2025

दूजा घर

Snowmelt in Ramdan Valley, above Turtuk

​ज़माना-ओ-मकाँ की फ़सील पर

जब जमूद-ए-बर्फ़ पिघलता है

और श्योक के साकिन साहिल पर

​आब-ए-रवाँ की बारीक सदायें गुज़रती हैं

उस वक़्त.... इक सन्नाटा बोल पड़ता है।

इक कहकशाँ जो है रिश्तों की।

पानी की कल-कल सदाओं में

बहता हुआ ख़्वाब है या कोई पुराना अक्स?

पत्थरों की आगोश में

लम्स-ए-आशना मुस्कुराता है

तुर्तुक...

तू तो मेरे अफ़्कार की वो ख़ल्वत-गाह है

जहाँ मेरी तन्हाई ख़ुद को बेगाना नहीं समझती

तू मेरा दूजा वजूद है,

तू मेरा दूजा घर है।